Saturday, May 2, 2015

चाँद पागल हो गया { ग़ज़ल }

बेख़बर सोती रही तो चाँद पागल हो गया
इस तरह की दिल्लगी तो चाँद पागल हो गया

रौशनी मेरे बदन की रात के पिछले पहर
चांदनी सी खिल गयी तो चाँद पागल हो गया

रात भर आकाश पर काली घटा छाती रही
जब हवा ठंडी चली तो चाँद पागल हो गया

रात की रानी सी ख़ुशबू  शाम के ढलने के बाद
मेरी ज़ुल्फ़ों से उड़ी तो चाँद पागल हो गया

रूठ कर बादल चले हैं रूठ कर तारे चले
रूठ कर बदली चली तो चाँद पागल हो गया 

रात की तन्हाइयों की बात सोनी सुब्ह दम
शोख़ लहजे में कही तो चाँद पागल हो गया 

मनहरण घनाछरी छंद

कहत सुनत नहीं, लगत अनत नहीं,लगन लगी है ऐसी, मन घनश्याम की।
मन मदन मोहन, रंगरसिया सजन,बखानी न जाये छवि, ललित ललाम की।
छलक छलक अंग, यौवन कलश रस,काम की कमान बिन," सोनी" किस काम की।
बजे बांसुरी की तान, गूंजे गोपियों के गान, अनुपम अलोकिक, छवि ब्रजधाम की।    

प्रेम की मथुरा

मेरे जीवन के पतझड़ में तेरा मुखड़ा तो सावन है
कभी तू राम है मेरा  कभी छलिया मनभावन है 
बसो मन मीत  बनकर गीत मेरे मन के  मंदिर में 
मेरा मन प्रेम की मथुरा और अधरों पे  वृंदावन  है 

याद में उसकी पागल है

बहे जो आँख से आँसू मुहब्बत में गंगाजल है
तड़पता है ये दिल मेरा याद में उसकी पागल है
बहुत है धूप, मंज़िल दूर, तन्हा राह उल्फ़त  की
मेरी क़िस्मत में क्या कोई प्यार का प्यासा बादल है





गीत

अपनी ज़मीन पर आँसू बहुत हैं ख़ुशियाँ हैं कम
ख़ुशियाँ बाँट लें आजा भुला दें दुनियाँ  के ग़म  

घिर आये रे दुक्ख के मौसम
हुआ जाता है मौसम ये बोझल
मुस्काने सारी धोने से पहले
आ जाओ हम ख़ुशियाँ बाँट लें। आजा भुला दें ....

हो चलो चलकर मुहब्बत बचाएं
वक़्त है आदमियत बचाएं
इंसानियत की ये इल्तज़ा है
मिल जुल के हम ख़ुशियाँ बाँट लें।  आजा भुला दें …

हम तो पंछी हैं इक आसमाँ  के
दो ये आवाज़ सारे जहाँ से
कहते हैं हम से  दुनियाँ के सारे
 दीनो धरम ख़ुशियाँ बाँट लें। आजा भुला दें …

अब के यूँ आये जीने का मौसम
सबको मिल जाये जीने का मौसम
सपनों की जन्नत बन के हक़ीक़त
चूमें क़दम ख़ुशियाँ बाँट लें।  आजा भुला दें …

कोई उजड़े घरों को न रोये
कोई अपने चहेते न खोये
अब दिन  न आये आँखें किसी की
करने का नम ख़ुशियाँ बाँट लें।  आजा भुला दें …

अपनी जन्नत को जलने न देंगे
दिन को शब में बदलने न देंगे
तुझको अँधेरे डसने खड़े हैं
थम यार थम खुशियां बाँट लें।  आजा भुला दें …